Jai Baba Pashupatinath #5

(Shrikanth, Sharda)
अपार सुन्दरी
अपना सुन्दर मुखड़ा घूंघट में छिपाए बैठे हो
शायद इसलिए, कहीं मेरी दृष्टि न लग जाएं
अब तो मै स्वयम इस चंद्रमुखि को देखूंगा
ये क्या
आपने तो मदिरा पी रखी है
पीने के वस्तु, पी जाती है
खाने के वस्तु, खाई जाते है
पीने के पस्तु, पी जाते है
माँ तुम्हारे सुन्दर्ता की बड़ी प्रशांसा करती है
अब मैं भी तुम्हारी इस सुन्दर्ता का स्वाद चखुं
छी छी छी, दूर रखो
मदिरा की दुर्गंध मेरा दम घुट जाएगा
तुम्हें इतना अभिमान
अभिमान कैसा
मैं तो आपको चरणों की दासी हूँ, लेकिन मदिरा की दुर्गंध मुझे सहन नहीं होती
धीरे धीरे सब कुछ सहना की आदत पड़ जाएगी
नहीं स्वामी नहीं, मैं ऐसी दुर्गंध से मर जाउंगी
तु मुझे स्वीकार नहीं करोगी
स्वामी, आप तो मेरा जीवन धन हैं, परमेश्वर हैं, किंतु मदिरा सेवन करनेवाला रुप, मुझे स्वीकार नहीं
मैं भी तुम्हें पत्नी के रूप में जीवन भर स्वीकार नहीं करुंगा
बाबा पशुपतिनाथ, मेरी रक्षा करना

सदा सुहागिन रहो, दूधों नहाओ, पूतों फलों
बेती, तुम प्रसन्न तो हो न
हाँ माँ, बहुत खुश हूँ, आपका आशीर्वाद जो है

ये क्या, श्रीकांत यहाँ सोया है
अवश्य कोई बात है

आओ मेरे साथ
क्या हुआ, कहाँ ले जा रहे हो
कुछ बताओ तो सही
तुम्हारे लाड़ले बहु के कक्ष में नहीं सोये थे
कहाँ सोया था
जा कर देखो कहाँ सोया है

बहु ने तो हमें कुछ नहीं बताया
सद्गुण लड़कीयों के यही लक्षण होते है