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(Savitri, Sharda)
माँजी, लीजिए प्रसाद
माँजी, आप मुझसे इस तरह क्यों देख रही है
बेटी, स्त्री स्वभाव से शांत और सुशील होती है, लेकिन तुम स्त्री नहीं, देवी हो
माँजी
इतनी बड़ी बात हो गयी और तुमने बताया तक नहीं
रात भर वेदना की आँसू पीती रही थी, और आँखों में उसकी झलक तक नहीं
माँजी
बेटी, मै जानती हूँ मेरा बेटा क्या है. बचपन के लाड़-प्यार और इस घर के वैभव ने, उसे हर मनमानी करने के लिए सहारा दिया
हमने तुम जैसे गरीब घर के लड़की इस लिए ब्याह किया के मरते समय तुम्हारे बाप को वचन दिया था
ये सब सोच कर्के तुम उसे सही मर्ग पर ले लाओगी. अब अगर तुम इस में सफल नहीं हुई, तो हमारा किया व्यर्थ हो जाएगा
माँजी, मैं प्रयत्न करुंगी, अवश्य करुंगी
मैं उसे तोड़कर रख दुंगी
तु कुछ नहीं कर सकेगी
मेरे प्यार को ठुकराकर, धनवान से प्यार चली न, कर लिया न ब्याह ब्याह
उसने वचन देकर धोखा दिया, धीरज
और तू ने उसके धोके पर अपने आप की समर्पित कर दिया न
वह अधि अंगस्पर्श से अधिक कुछ नहीं पा सका है
अब तुमने क्या सोचा हैं
मैं उसका सब कुछ मिटा डालूँगी
तुम्हें मेरी सहायता करनी होगी
हो गयी न कढ़ी पतली
ये काम अपन का नहीं है
सुनते हो
रंबा, किसी ने तेरा पीछा तो नहीं किया न
अरे, किसी ने मेरा पीछा किया तो खोपड़ी तोड़कर भरता न बना दूंगी
फिर क्यों तुम हँफ रही हो
अरे, दौड़कर आयी हूँ
अच्छा, बोल, बात क्या है
पता चला है, दुलहनजी सोहाग की सेज पर अकेली तड़पती रही है
ललाजी दुसरी जगह मदिरा पीकर सो रहे थे
अच्छा
और, एक तुम हो, अंदर आते ही दिपा बुझा दिया था
मैं ललाजी के जैसे बुद्धु नहीं हूँ
चलो, हटो
तुम मुझसे रूठी हो
नहीं जी, बहुत प्रसन्न हूँ
तुमने मेरा हृदय तोड़कर, बहुत पाप किया है
उरवशी, मैं निर्दोष हूँ
निर्दोष हो
वचन मुझे दिया, ब्याह किसि और से किया
ये ब्याह नहीं, उरवशी, ........... है
अगर मैने शादी नहीं की होती तो मेरी पिताजी आत्महत्याकांड लेते
तुम आपने बाप को बचाने के लिए मुझे जीता मर्दन
